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Bihar Politics: क्या बिहार को मिलेगा कार्यकारी CM?
- Reporter 12
- 30 Mar, 2026
क्या बिहार में कार्यकारी मुख्यमंत्री की चर्चा सिर्फ अटकल है या सत्ता परिवर्तन की लिखी जा चुकी पटकथा? नीचे पढ़ें संपादकीय नजरिया
पटना: बिहार की राजनीति एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ी दिख रही है, जहां हर छोटी हलचल बड़े संकेत देती नजर आ रही है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के विधान परिषद से इस्तीफे और राज्यसभा जाने की तैयारी के बीच अब एक नई चर्चा ने जोर पकड़ लिया है—क्या बिहार को वर्षों बाद एक कार्यकारी मुख्यमंत्री मिल सकता है? सियासी गलियारों में इस सवाल ने अचानक गंभीरता ले ली है। इसकी वजह सिर्फ सत्ता परिवर्तन की अटकलें नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपा राजनीतिक गणित भी है।
राजनीतिक हलकों में यह माना जा रहा है कि बिहार में आने वाले दिनों में जो भी बदलाव होगा, वह सीधे-सीधे साधारण सत्ता परिवर्तन जैसा नहीं होगा। क्योंकि यहां मामला केवल मुख्यमंत्री की कुर्सी का नहीं, बल्कि जदयू-भाजपा के भविष्य, नेतृत्व संतुलन, चुनावी रणनीति और उत्तराधिकार की राजनीति से भी जुड़ा हुआ है। यही वजह है कि “कार्यकारी सीएम” का शब्द अचानक बिहार की चर्चा के केंद्र में आ गया है।
बैठकों के बाद तेज हुई अटकलें
रविवार को मुख्यमंत्री आवास पर जदयू के कई वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी ने राजनीतिक अटकलों को और हवा दे दी। सामान्य बैठकों को बिहार की राजनीति में हमेशा गंभीरता से देखा जाता है, लेकिन जब सत्ता परिवर्तन जैसी चर्चा पहले से चल रही हो, तब हर बैठक का अर्थ और बड़ा हो जाता है। इसी के बाद से यह चर्चा फैलने लगी कि बिहार में किसी स्थायी चेहरे की बजाय पहले एक अंतरिम या कार्यकारी नेतृत्व का मॉडल अपनाया जा सकता है।
यह चर्चा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि बिहार जैसे बड़े और राजनीतिक रूप से संवेदनशील राज्य में मुख्यमंत्री बदलना सिर्फ प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं होता। इसके साथ गठबंधन की स्थिरता, जातीय-सामाजिक समीकरण, पार्टी के भीतर नेतृत्व का संतुलन और जनता के बीच संदेश—इन सभी बातों का ध्यान रखना पड़ता है। ऐसे में कार्यकारी मुख्यमंत्री का विकल्प कई राजनीतिक दलों के लिए “ट्रांजिशन मॉडल” की तरह देखा जा रहा है।
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आखिर कार्यकारी मुख्यमंत्री की चर्चा क्यों?
बिहार की मौजूदा राजनीतिक स्थिति को देखें तो यह साफ है कि कोई भी बड़ा फैसला बहुत सोच-समझकर लिया जाएगा। नीतीश कुमार का राजनीतिक कद इतना बड़ा है कि उनके बाद किसी चेहरे को सीधे पूर्णकालिक मुख्यमंत्री बनाना आसान नहीं माना जा रहा। यही कारण है कि कार्यकारी मुख्यमंत्री की चर्चा एक संभावित राजनीतिक समाधान के रूप में सामने आ रही है।
इस मॉडल के तहत किसी ऐसे चेहरे को कुछ समय के लिए मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है, जो सत्ता संचालन संभाले, लेकिन अंतिम राजनीतिक दिशा पर नीतीश कुमार और गठबंधन नेतृत्व की नजर बनी रहे। इससे सत्ता परिवर्तन का संदेश भी नियंत्रित रहेगा और नई व्यवस्था को परखने का समय भी मिल जाएगा।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विकल्प इसलिए भी उपयोगी हो सकता है क्योंकि इससे सरकार में अचानक झटका नहीं लगेगा। प्रशासनिक निरंतरता बनी रहेगी और जनता के बीच यह संदेश जाएगा कि बदलाव व्यवस्थित तरीके से हो रहा है, न कि किसी राजनीतिक संकट की वजह से।
पहली वजह: नीतीश कुमार की भूमिका खत्म नहीं, सिर्फ बदल सकती है
इस पूरे कयास के पीछे सबसे बड़ी वजह यही मानी जा रही है कि यदि नीतीश कुमार राज्यसभा के रास्ते राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाते हैं, तब भी बिहार की राजनीति पर उनकी पकड़ तुरंत खत्म नहीं होगी। यानी वे मुख्यमंत्री पद छोड़ भी दें, तब भी सरकार के संचालन, नीतियों और फैसलों पर उनका प्रभाव बना रह सकता है।
यही वजह है कि कार्यकारी मुख्यमंत्री को कुछ समय के लिए “परीक्षण मॉडल” के तौर पर देखा जा रहा है। ऐसा चेहरा सामने लाया जा सकता है, जो सरकार चलाए, लेकिन बड़े राजनीतिक फैसले अब भी नीतीश कुमार की सलाह और सहमति से तय हों। इस व्यवस्था में दिल्ली और पटना के बीच सत्ता का एक संतुलित समीकरण बन सकता है।
अगर ऐसा होता है, तो यह बिहार की राजनीति में एक दिलचस्प प्रयोग होगा—जहां पद किसी और के पास होगा, लेकिन नैतिक और राजनीतिक नियंत्रण किसी हद तक अब भी नीतीश कुमार के पास रह सकता है।
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बिहार में कार्यकारी मुख्यमंत्री का इतिहास भी रहा है
यह चर्चा पूरी तरह नई नहीं है। बिहार के राजनीतिक इतिहास में पहले भी ऐसे मौके आए हैं, जब राज्य ने सीमित अवधि के लिए कार्यकारी नेतृत्व देखा है। हालांकि वह दौर और परिस्थितियां अलग थीं, लेकिन संवैधानिक और राजनीतिक दृष्टि से यह मॉडल बिहार के लिए बिल्कुल अनजान नहीं है।
यही ऐतिहासिक पृष्ठभूमि इस चर्चा को और गंभीर बना देती है। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि अगर किसी कारण से स्थायी नेतृत्व को लेकर तुरंत सहमति नहीं बनती, तो कार्यकारी मुख्यमंत्री का रास्ता अपनाया जा सकता है। इससे गठबंधन के भीतर समय भी मिलेगा और बाहरी तौर पर सरकार की निरंतरता भी बनी रहेगी।
इतिहास बताता है कि बिहार की राजनीति में “अस्थायी व्यवस्था” कई बार स्थायी समीकरण तय करने का माध्यम भी बनी है। इसलिए इस बार भी इस संभावना को हल्के में नहीं लिया जा रहा।
दूसरी वजह: क्या उत्तराधिकार की राजनीति भी है चर्चा में?
बिहार की राजनीति में एक और नाम अब धीरे-धीरे चर्चा में आने लगा है—निशांत कुमार। लंबे समय तक सार्वजनिक और सक्रिय राजनीति से दूरी बनाए रखने के बावजूद हाल के दिनों में उनके नाम को लेकर राजनीतिक अटकलें तेज हुई हैं। ऐसे में कार्यकारी मुख्यमंत्री की चर्चा को कुछ लोग जदयू के भीतर भविष्य के नेतृत्व मॉडल से भी जोड़कर देख रहे हैं।
हालांकि इस पर आधिकारिक तौर पर कुछ भी स्पष्ट नहीं है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में यह बात कही जा रही है कि अगर सत्ता का एक संक्रमणकाल बनता है, तो उस दौरान पार्टी के भीतर नई पीढ़ी या उत्तराधिकार की संभावनाओं को भी परखा जा सकता है। इस नजरिए से देखें तो कार्यकारी मुख्यमंत्री का मॉडल सिर्फ सरकार चलाने का रास्ता नहीं, बल्कि राजनीतिक उत्तराधिकार की तैयारी भी हो सकता है।
अगर ऐसा कोई परिदृश्य बनता है, तो जदयू के लिए यह बेहद अहम चरण होगा। क्योंकि नीतीश कुमार के बाद पार्टी का चेहरा कौन होगा, यह सवाल सिर्फ संगठन का नहीं, बल्कि पूरे गठबंधन की दिशा तय करने वाला प्रश्न बन सकता है।
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तीसरी वजह: भाजपा भी अभी बड़ा जोखिम नहीं लेना चाहेगी
इस पूरे राजनीतिक समीकरण में भाजपा की भूमिका भी बेहद अहम है। अगर बिहार में मुख्यमंत्री पद को लेकर कोई बड़ा फैसला होता है, तो भाजपा-जदयू के रिश्तों और राष्ट्रीय राजनीति पर उसका सीधा असर पड़ सकता है। ऐसे में भाजपा भी फिलहाल कोई ऐसा कदम नहीं उठाना चाहेगी, जिससे गठबंधन के भीतर तनाव का संकेत जाए या विपक्ष को बड़ा हमला करने का मौका मिल जाए।
राजनीतिक चर्चा यह भी है कि आने वाले महीनों में देश के कई राज्यों में चुनावी माहौल रहेगा। ऐसे समय में बिहार जैसे बड़े राज्य में अचानक पूर्ण नेतृत्व परिवर्तन का संदेश भाजपा के लिए रणनीतिक रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकता है। इसलिए कार्यकारी मुख्यमंत्री का मॉडल उसके लिए भी एक “सेफ ऑप्शन” की तरह दिख सकता है।
इस व्यवस्था से भाजपा यह कह सकती है कि बिहार में बदलाव सहमति और स्थिरता के साथ हो रहा है, न कि किसी दबाव या टूटन के कारण। यह संदेश राष्ट्रीय राजनीति के लिहाज से भी उसके लिए उपयोगी हो सकता है।
सबसे बड़ा सवाल: अगर कार्यकारी CM बना, तो चेहरा कौन होगा?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर बिहार में सचमुच कार्यकारी मुख्यमंत्री का मॉडल सामने आता है, तो वह चेहरा कौन होगा? जदयू से, भाजपा से या किसी ऐसे नाम पर सहमति बनेगी जो दोनों दलों के लिए स्वीकार्य हो? फिलहाल इसका जवाब किसी के पास स्पष्ट नहीं है।
लेकिन इतना जरूर है कि यह फैसला सिर्फ राजनीतिक वफादारी के आधार पर नहीं होगा। इसमें प्रशासनिक अनुभव, गठबंधन की स्वीकार्यता, जातीय संतुलन और भविष्य की रणनीति—सभी बातों को तौला जाएगा। यही वजह है कि अभी तक किसी एक नाम पर सार्वजनिक चर्चा नहीं की जा रही, लेकिन अंदरखाने कई संभावनाओं पर जरूर विचार चल रहा होगा।
बिहार में बदलाव की पटकथा लिखी जा रही है?
बिहार की राजनीति में इस समय जो कुछ दिख रहा है, वह सामान्य हलचल से कहीं बड़ा है। मुख्यमंत्री पद, राज्यसभा, गठबंधन संतुलन, भाजपा-जदयू की रणनीति और संभावित उत्तराधिकार—इन सबके बीच “कार्यकारी मुख्यमंत्री” की चर्चा एक गंभीर राजनीतिक संभावना बनकर उभरी है।
फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि बिहार को वाकई कार्यकारी मुख्यमंत्री मिलेगा। लेकिन इतना जरूर है कि इस चर्चा के पीछे केवल अफवाह नहीं, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक गणित काम करता दिखाई दे रहा है। आने वाले कुछ दिन बिहार की राजनीति की दिशा तय करने वाले साबित हो सकते हैं।
अगर बदलाव हुआ, तो वह सिर्फ चेहरे का बदलाव नहीं होगा—वह बिहार की सत्ता संरचना के नए अध्याय की शुरुआत भी हो सकती है।
क्या बिहार में सत्ता परिवर्तन की पटकथा लिखी जा चुकी है?
बिहार की राजनीति में “कार्यकारी मुख्यमंत्री” की चर्चा यूं ही हवा में पैदा नहीं होती। जब मुख्यमंत्री आवास पर बैठकों का दौर तेज हो, राज्यसभा की राह खुल चुकी हो और सत्ता संतुलन को लेकर फुसफुसाहटें बढ़ने लगें, तब यह समझ लेना चाहिए कि राजनीति केवल दिख नहीं रही होती, बल्कि भीतर ही भीतर आगे बढ़ भी रही होती है।
नीतीश कुमार बिहार की राजनीति के ऐसे खिलाड़ी रहे हैं जिन्होंने कभी भी अपने अगले कदम को हल्के में नहीं उठाया। ऐसे में अगर कार्यकारी मुख्यमंत्री की चर्चा उठ रही है, तो यह सिर्फ एक संवैधानिक विकल्प नहीं, बल्कि एक सियासी ट्रांजिशन मॉडल भी हो सकता है। इससे सत्ता का हस्तांतरण अचानक नहीं, बल्कि नियंत्रित तरीके से किया जा सकता है।
इस चर्चा का दूसरा बड़ा पहलू यह है कि भाजपा और जदयू दोनों फिलहाल ऐसा कोई जोखिम नहीं लेना चाहेंगे, जिससे बिहार में अस्थिरता का संदेश जाए। ऐसे में कार्यकारी मुख्यमंत्री का फॉर्मूला दोनों दलों के लिए एक राजनीतिक बफर की तरह काम कर सकता है। इससे एक तरफ सत्ता का नया चेहरा सामने आएगा, तो दूसरी ओर पुराना नेतृत्व पूरी तरह हाशिए पर भी नहीं जाएगा।
अगर बिहार में ऐसा होता है, तो यह सिर्फ मुख्यमंत्री बदलने की घटना नहीं होगी। यह नीतीश युग से उत्तर-नीतीश युग में प्रवेश की शुरुआत होगी। और यही वजह है कि आने वाले दिनों में बिहार की राजनीति सिर्फ फैसलों से नहीं, बल्कि संकेतों से भी पढ़ी जाएगी।
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